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Showing posts from September, 2022

टिमटिमाते तारे

रोजाना की तरह आज भी काजल स्कूल का काम पूरा करके घर की छत की तरफ भागी। खुले आसमान में तारों को देख कर उसका चेहरा खिल उठा। आसमान तारों से जगमगा रहा था मानो किसी ने सारे  आकाश में जुगनू बिखेर दिए हो। आकाश में टिमटिमाते हुए तारों को देखकर उसका मन रोमांचित हो गया और वह खुशी से खिल उठी। 11 साल की काजल को लगता था इन तारों में से कोई परी आएगी और उसके मन की सारी इच्छा पूरी कर देगी। जैसे ही कोई तारा तेज टिमटिमाने लगता काजल अपने मन की इच्छा है उसे बोलने लगती। अभी नीचे से आवाज आती है "काजल सोना नहीं है क्या सुबह स्कूल भी जाना है।" अपनी मां की आवाज सुनकर काजल मन मार कर चली जाती है और सो जाती है। तारों से बातचीत का यह सिलसिला कई साल तक चलता रहता है। अब काजल 11 साल के बच्ची नहीं बल्कि 21 साल की युवती हो गई है और अब उसकी इच्छाएं तारों से गुड़िया या खिलौने मांगने की नहीं रही। उसकी उम्र के साथ उसकी इच्छाएं भी जवान हो गई थी। उम्र के इस बदलाव को नजर में रखते हुए उसके माता पिता ने उसकी शादी करने का फैसला किया। समय बीतता गया ।माता -पिता  और तारों के बीच में चुलबुली सी काजल अपनी जिंदगी बिता रही थी।...

औरत या जरूरत

 दुनिया का हर एक रिश्ता अपनी जरूरत से बंधा है, जैसे ही जरूरत खत्म होती है वैसे ही रिश्ता भी दम तोड़ देता है। इस समाज को औरत की जरूरत हमेशा से रही है चाहे वह मां के रूप में हो चाहे पत्नी के रूप में, चाहे बेटी या बहन के रूप में हो लेकिन यह पुरुष जाति हमेशा से औरत जाति की कर्जदार रहेंगी।

मेरा अस्तित्व

 बेशक आज समाज बहुत आगे बढ़ गया है लड़के और लड़की को एक ही तराजू पर तौला जाने लगा। हमारा समाज बहुत बड़ी-बड़ी बातें करता है कि लड़के और लड़की में कोई फर्क नहीं है, दोनों को एक जैसे शिक्षा का अधिकार है, दोनों ही अपने-अपने तरीके से स्वतंत्र हैं लेकिन क्या सचमुच हमारी मानसिकता ऐसी है? क्या सचमुच हमारे समाज में लड़कियों को लड़कों को बराबर का दर्जा मिला हुआ है? क्या हमारा मन , हमारी सोच इस चीज को मानने के लिए तैयार है? चलिए आइए एक बहू की नजर से इस सवाल का जवाब ढूंढते हैं... बड़े प्यार से मां बाप अपनी बेटी को पढ़ाते हैं, लिखाते हैं इस काबिल बनाते हैं कि वह समाज में सर उठाकर जी सके, अपने पैरों पर खड़ी हो सके, अपना एक अस्तित्व बना सके। लेकिन वही बेटी जब शादी करके ससुराल जाती है तो क्यों उसका अस्तित्व कहीं खो सा जाता है? पति, सास ,ससुर ,ननंद सब को खुश रखने की जिम्मेदारी उसके सर पर आ जाती है। क्या मेरा यह सवाल गलत है? आज भी अधिकांश घरों में ऐसा देखने को मिलता है कि बहू सब को खुश रखने की जिम्मेदारी उसके ऊपर आ जाती है। यह मेरी सोच है मैं जानना चाहती हूं कि आपकी क्या सोच है आप क्या सोचते हो तो ...