मेरा अस्तित्व
बेशक आज समाज बहुत आगे बढ़ गया है लड़के और लड़की को एक ही तराजू पर तौला जाने लगा। हमारा समाज बहुत बड़ी-बड़ी बातें करता है कि लड़के और लड़की में कोई फर्क नहीं है, दोनों को एक जैसे शिक्षा का अधिकार है, दोनों ही अपने-अपने तरीके से स्वतंत्र हैं लेकिन क्या सचमुच हमारी मानसिकता ऐसी है? क्या सचमुच हमारे समाज में लड़कियों को लड़कों को बराबर का दर्जा मिला हुआ है? क्या हमारा मन , हमारी सोच इस चीज को मानने के लिए तैयार है?
चलिए आइए एक बहू की नजर से इस सवाल का जवाब ढूंढते हैं...
बड़े प्यार से मां बाप अपनी बेटी को पढ़ाते हैं, लिखाते हैं इस काबिल बनाते हैं कि वह समाज में सर उठाकर जी सके, अपने पैरों पर खड़ी हो सके, अपना एक अस्तित्व बना सके। लेकिन वही बेटी जब शादी करके ससुराल जाती है तो क्यों उसका अस्तित्व कहीं खो सा जाता है? पति, सास ,ससुर ,ननंद सब को खुश रखने की जिम्मेदारी उसके सर पर आ जाती है। क्या मेरा यह सवाल गलत है? आज भी अधिकांश घरों में ऐसा देखने को मिलता है कि बहू सब को खुश रखने की जिम्मेदारी उसके ऊपर आ जाती है। यह मेरी सोच है मैं जानना चाहती हूं कि आपकी क्या सोच है आप क्या सोचते हो तो कृपया करके अपने विचार मुझे जरूर भेजें मैं कोशिश करूंगी कि मैं भी उस नजरिए से सोच सकूं।।
आपकी आभारी
दीपिका जैन
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